April 18, 2021
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संसाधनों और विकास के अभाव में हो रही है प्रथम केदार की उपेक्षा..

बूढाकेदार मंदिर टिहरी। पहला केदार कहे जाने वाले बूढाकेदार मंदिर की महत्ता सदियों से है लेकिन काफी समय से संसाधनों और विकास के अभाव में इसकी उपेक्षा हो रही है। यह मंदिर जिला टिहरी के घनसाली के समीप स्थित है। माना जाता है कि इस मंदिर की स्थापना खुद सतयुग में भगवान शिव ने की थी। भगवान शिव पहले यहीं निवास करते थे और यही वो स्थान है जिसे छूने मात्र से पांडव एक बड़े पाप से मुक्त होकर स्वर्ग चले गए थे।  इस मंदिर में कई प्राचीन मूर्तियां हैं। वहीं स्थानीय समाज सेवक भारत सिंह ने बताया की.. मंदिर को लेकर कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं।

कहा जाता है कि कुरूक्षेत्र के युद्ध में पांडवों ने कौरवों को मार दिया था। अपने ही परिवार के लोगों का वध कर देने पर पांडवों पर गोत्र हत्या का पाप लग गया था। इस पाप से मुक्ति पाने के लिए पांडवों ने भगवान शंकर से समाधान पूछा था। तब भगवान शंकर ने पांडवों को उत्तर दिशा की और जाने को कहा था। बूढाकेदार में भगवान शिव ने पांडवों को बूढे के रूपमें दर्शन देकर उन्हें पाप मुक्त किया था। तभी से इस स्थान को बूढ़ाकेदार कहा जाता है। यह कथा भी प्रचलित है कि जब पांडव उत्तर दिशा की तरफ जा रहे थे तब बीच में एक जगह पर भगवान शिव ने भैंस का रूपधारण किया हुआ था। पांडवों को यहां भगवान के रहने का आभास हुआ, तो भीम ने भैंसों के आने-जाने वाले रास्ते में अपनी दोनों जांघ फैला दी। इस दौरान सामान्य भैंसे जांघ के पीछे से चलते गई। लेकिन अन्तिम में भैंस बने भगवान शिव जैसे ही जांघ के पास आए तो उन्होंने भीम की जांघ पर गदा से वार किया। इसी दौरान पांडवों ने शिव को पकड़ना चाहा तो भगवान शिव दलदल में समा गए। दलदल में सामने के बाद उनका सिर नेपाल के पशुपतिनाथ में निकला, पीछे का हिस्सा उत्तराखण्ड के केदारनाथ में निकला और शरीर का शेष भाग बूढाकेदार में ही रहा, जो बूढाकेदार के नाम से प्रसिद्ध हुआ। रावल ही कर सकते हैं पूजा पौराणिक काल से ही इस मन्दिर के पुजारी केवल रावल होते हैं। इनकी विशेषता जन्म से छिद इनके कान होते हैं। जब भी किसी रावल की मृत्यु होती है, तो उसे मन्दिर के प्रांगण में ही समाधि दी जाती है। मान्यता यह भी है कि बूढाकेदार के लोग केदारनाथ की यात्रा पर नहीं जाते। माना जाता है कि अगर वे ऐसा करते हैं तो उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने पड़ते हैं। यदि कोई जाने का इच्छुक है तो पहले उसे बूढाकेदार बाबा से अनुमति लेनी पड़ती है। नहीं घोषित हो सका पांचवां धाम काफी समय से लोग बूढाकेदार को पांचवे धाम की मान्यता दिलाने की मांग कर रहे हैं। पूर्व में यह चार धाम यात्रा का प्रमुख पडाव था। तब देश-विदेश के श्रद्धालु व पर्यटक यहीं से होकर चार धाम यात्रा पूरी करते थे। मान्यता है कि चारोंधाम के साथ यदि बूढा केदार के दर्शन नहीं किए, तो यात्रा अधूरी मानी जाती है। लेकिन अब चार धाम यात्रा पर आने वाले श्रद्धालु भी कम संख्या में इस ओर रुख करते हैं। इसी कारण से इस जगह का विकास भी नहीं हो सका है। यही वजह है कि इसे पांचवें धाम की मान्यता दिलाने के लिए मांग भी की जा चुकी है। हालांकि, सरकार की अनदेखी के कारण ऐसा हो नहीं पा रहा है। 2012 में आई आपदा के कारण इस मन्दिर के नीचे तक भी धर्मगंगा ओर बालगंगा नदी का पानी आ गया था, जिससे मन्दिर के नीचे कटाव हुआ। अफसोस की इस कटाव के बाद भी मंदिर के लिए कोई सुरक्षा दीवार नहीं बनाई गई। धार्मिक महत्व से अति महत्वपूर्ण यह पहला केदार भक्तों के लिए तरस रहा है। सरकारी की अनदेखी और धन के आभाव में 22 सालों से निरन्तर बन रहा मंदिर अभी भी पूरा नहीं हो सका है। बता दें कि मंदिर के पास ही भिलंगना नदी का उद्गम खतलिंग ग्लेशियर है, जो प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है। यहां के बुग्याल (घास के ढलवे मैदान) भी देखने लायक है। ऐसे में इस पावन स्थान को इसकी धार्मिक महत्ता और सुंदरता के कारण उभारने की जरूरत है।

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