April 19, 2021
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ठेकेदार पत्रकार है समाज के घुन:अर्चना

अरुण कश्यप

हरिद्वार : शायद पहली बार ही सही पर वर्तमान समय मे भ्रष्टाचार की भेट चढी पत्रकारिता पर आज हरिव्दार की जिला सूचना अधिकारी सुश्री अर्चना ने अपनी सौशल मीडिया पर जारी एक पोस्ट मे खुलकर शब्दों के बाण चलाये उन्होने कहा कि ठेकेदार पत्रकार बने समाज और पत्रकारिता के घुन..

आज पत्रकारिता के मानक बदल गये, अधिकांश पत्रकार केवल नाम के ही है। इनका ध्येय केवल प्रतिष्ठा पाना, सुविधा लाभ लेना और पैसा कमाना मात्र है। आज आलम ये है अधिकाश ठेकेदारो ने पत्रकारिता का चोला ओढ़ लिया है जो विभागो द्वारा निकाले जाने वालों कार्य के ठेको को अपने इसी रौब से लेते है पर उनकी जॉंच करेगा कौन ? इलेक्ट्रिनिक मीडिया ने इनका रास्ता और भी आसान कर दिया है। आज बिना किसी योग्यता के आप चैनल की आईडी ला सकते हो, सबसे बडी बात की चैनल को कोई फर्क नही कि आप पढे-लिखे हो भी या नही। एक चैनल आईडी लाने वाले ने अपने नीचे कई लोगो को रखा है वो भी बिना वेतन के कार्यरत है, ईश्वर जाने उनका गुजारा कैसे होता है। समाज में कुछ लोग ऐसे भी जिनको कोई पत्रकार नही बना रहा तो जनाब अपना ही साप्ताहिक समाचार पत्र निकाल सीधे सम्पादक बन जाते है, आय के स्रोतों की बात करे तो कई पत्रकारों ने टेम्पो स्टैंड में डेरा डाला है,तो कई ने ब्याज खोरी तो कई ने मनुष्यता की दहलीज पार करके ब्लेकमेलर ओर दल्लो की भूमिका भी निभा ली जिनका भुगतान उनके परिवारों को ताउम्र चुकाना पड़ेगा ।

पत्रकार बनने की समस्या भी खत्म। इनका समाचार पत्र छप रहा है या नही, क्या छप रहा है। इनको खुद भी पता नही,क्योकि समाचार पत्र छपने का ठेका छोड़ा हुआ है। इनको तो बस 50 छपी प्रतियॉ मिल जाये जिनमें से कुछ अधिकारियो की टेबल पर, नेता जी की बैठक में और कुछ अपने साथ लेकर घूमते है और कोई मिल जाये तो उसे अपने पत्रकार/सम्पादक का रौब गालिब कर सके। ऐसे कई लोग मिल जायेगे जो दो या तीन साप्ताहिक समाचार पत्र का रजिस्ट्रेशन किये है और मान्यता तक ले रखी है। कुछ साप्ताहिक/पाक्षिक द्वारा तो पत्रकार आई कार्ड ऐेसे बॉट रखे है जैसे रेवड़ी, सूचना विभाग तो ये जहमत तक नही उठाता कि इन कार्डधारी पत्रकारों का आउटपुट क्या है जिस समाचार पत्र द्वारा इनको कार्ड दिया गया क्या ये उस स्तर के है ? चिराग तले अंधेरा कहावत चरितार्थ होती है यहॉ, राज्य सरकार द्वारा मान्यता अधिकाश उन दैनिक/साप्ताहिक समाचार पत्र के लोगो ने ली है जिनका सीधे पत्रकारिता से कोई लेना देना नही। इनकी तो खबर भी ऐसा व्यक्ति भेजता है जो सही मायने में पत्रकार है किन्तु लक्ष्मी के अभाव में खबर ठेकेदार बने हुए है, मतलब ऐसा व्यक्ति जो कई कथित पत्रकारो की खबरो को उनके समाचार पत्र तक भेजता है। पहले पत्रकारिता में डिग्री/डिप्लोमा भले ही न हो पर स्नातकोत्तर वाले जरूर होते थे पर वर्तमान में कई मान्यता प्राप्त पत्रकारों ने तो हाईस्कूल भी मान्यता मिलने के बाद की है। ये इस दौर का सबसे कढ़वा सच है एक अधिकारी जो लिखित और बौद्धिक परीक्षा के बाद पद पर बैठा है उससे प्रश्न ऐसा व्यक्ति पूछता है जिसके पास डिग्री, व्यवहारिक ज्ञान और विजन तक नही। पत्रकारों की इस पैदावार के लिए कही ना कही जिले के सूचना विभाग भी जिम्मेदार है उनके पास तो वास्तव में कोई सूची ही नही है कि कौन पत्रकार है और कौन पत्रकार का लेबल? सरकारी प्रेस वार्ता में इन्ही लोगो की भरमार होती है जो केवल अपनी उपस्थिति दर्ज करते है वे वार्ता में एक प्रश्न तक नही करते, अरे भाई करे भी तो कैसे इनकी तो सम्बधित विषय पर जानकारी शून्य होती है। सूचना अधिकारी महोदय की नजर में तो  असली पत्रकार वो है जो नेताओं और बड़े अधिकारियों आये बाये मडराते रहते है। कुछ एक को तो आप इन नेताओं और बड़े अधिकारियों के कार्यालय व आवास पर परमानेंट देख सकते हो। मान्यता के मानको की जॉच अगर सही ढ़ग से की जाये तो जिन पत्रकारो ने अपने संस्थान वेतन का प्रमाण पत्र दिया है वो तक फर्जी होगा, दर्शाया मानदेय तो उनको मिलता ही नही पर जनाब सूचना अधिकारी जी के द्वारा कोई जॉच या अग्रिम कार्रवाई इस सम्बध में नही की गयी। इसके दो ही कारण हो सकते है या तो वे अपनी नौकरी आराम के साथ चलाकर पेशन लेने का मकसद बना रखा है या फिर विभाग और पत्रकार की आपसी सांठ-गांठ।

शहर के 15 प्रतिशत वाहनो वाहनो पर प्रेस लिखा मिल जायेगा, यहॉ तक की कपड़े प्रेस करने वाले की मोटरबाईक पर भी। जो लोग एक या दो माह के लिए समाचार पत्र के लिए डोर टू डोर मार्केटिग करते है वे भी वाहन पर प्रेस लिखवा लेते है,पर काम भले ही खत्म हो जाये पर वो स्टीकर बदस्तूर लगा रहता है। आर.टी.ओ विभाग अपने कार्य की इतिश्री सूचना विभाग पर डालकर कर लेता है और सूचना विभाग ये कहकर कि ‘‘कौन दुश्मनी मोल ले’’

अंत में सरकार को एक नसीहत जॉच करे ऐसे पत्रकारों की जो अल्प समय में साईकल से टोयटा और किराये के मकान से विला में आ गये है। इनके पास ऐसा क्या मंत्र आ गया कि अकूत सम्पति के मालिक बन बैठे। ऐसे घुन को नजरअंदाज किया तो खोखला हो कर भरभरा कर गिर जायेगा ये लोकतंत्र का चौथा स्तंभ..

 

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