Home अभी-अभी हिमालयी राज्य कान्कलेव में मात्र ढकोसला- किशोर उपाध्याय।

हिमालयी राज्य कान्कलेव में मात्र ढकोसला- किशोर उपाध्याय।

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संवाद सूत्र 

मसूरी : पहाड़ों की रानी मसूरी में आयोजित हिमालय कॉन्क्लेव पर कांग्रेस के दिग्गज व पूर्व प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय ने जबरदस्त पलट वार करते हुए कहा कि भाजपा ने जहां हिमालयी राज्यों की भौगोलिक परिस्थिति, पलायन एवं विकास की योजनाओं का खाका तैयार करने के उद्देश्य को ले कर मसूरी में करोड़ों रुपये खर्च किये हैं ,वहीं इस कॉन्क्लेव में प्रधानमंत्री की जगह पर वित्त मंत्री का भेजना यह साबित करता है कि यह आम जनता को मूर्ख बनाने के लिए मात्र ढकोसला किया गया है। इस बैठक में प्रधानमंत्री को होना चाहिए था।

मसूरी आये कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि इन दिनों भारी बरसात के चलते कई राज्य आज आपदा की चपेट में हैं,जिसमें उत्तरपूर्व के राज्य है अच्छा होता कि सरकार हिमालयी राज्यों की इस कॉन्क्लेव की जगह पर उन राज्यों की मदद करते जहां पर ,हजारों लोग बेघर हो गए हैं, इससे अच्छा संदेश भी जाता। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इस कॉन्क्लेव में स्थानीय मीडिया से भी दूरी बनाई गई है। जिससे साफ जाहिर होता है कि यह मात्र एक पिकनिक के तौर पर आयोजन था जिसे हिमालयी राज्यों की कॉन्क्लेव का नाम दिया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर जन भावनाओं के अनुसार यह कान्कलेव सफल नहीं होता तो हिमायली क्षेत्र के जानकारों के साथ मसूरी में ही कान्कलेव करेंगे। जिसमें विषय विशेषज्ञों को बुलाया जायेगा। जब तक हिमालयी क्षेत्र के दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वालों को काम नही मिलेगा जो हिमालय को जीते है हिमालय में रहते है व यहां होने वाली हर परेशानी को चुनौती के रूप में स्वीकार करते है, उनकी कोई राय नहीं ली गई। आपस में विचार कर किया जाता तो कुछ न कुछ इस सम्मेलन से जरूर निकल कर आता। आने वाले समय पर कांग्रेस ठोस रणनीति के तहत मसूरी में ही हिमालय राज्यों की विभिन्न समस्याओं को ले कर एक बैठक आहूत करेगी। हिमालयी राज्यों पर पहली बैठक नहीं है पहले सुंदरलाल बहुगणा के नेतृत्व में हिमाचल में तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमिल के समय में आयोजित की गई थी। जो लोग भारतीय संस्कृति की बात करने है तो इसका नाम कान्कलेव क्यों दिया यह समय ठीक नहीं असम से उत्तरपूर्व के सभी राज्य बाढ़ से पीडित है उनकी मदद करते ज्यादा ठीक रहता। हमने जो वनाधिकार आंदोलन के मुददे दिए थे उसी को इस सम्मेलन का आधार बनाया गया है। हमने मांग की थी कि जो लोग वनों पर निर्भर है जों वनवासी हैं उन्हें एक गैससिलेंडर व केद्र की सेवाओं में आरक्षण दिया जाना चाहिए जैसे चकराता में दिया जाता है। यहां रहने वालों को सौ यूनिट बिजली, हक हकूक के तहत लकड़ी पत्थर सभी मिल सकता है। कृषि के क्षेत्र में बार्डर माइग्रेसन है वह तब तक नहीं रूक सकता जब तक यहां के लोगों के लिए रोजगार के प्रबंध नहीं किए जाते।

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