Home अभी-अभी राज्य आंदोलन के इतिहास मे बाटाघाट कांड पुलिस दरिंदगी का काला पन्ना।

राज्य आंदोलन के इतिहास मे बाटाघाट कांड पुलिस दरिंदगी का काला पन्ना।

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बिजेंद्र पुंडीर

मसूरी : 15 सितंबर 1994 का दिन उत्तराखंड व भारत के इतिहास का ऐसा काला पन्ना है जिसका जिक्र करते ही रूह कांप उठती है। पुलिस के वहशी पन की पराकाष्ठा, दरिंदगी, व क्रूरता का इससे बड़ा इतिहास विश्व के किसी भी देश व युद्ध में नहीं मिलता। इस घटना में पुलिस ने जहां राज्य आंदोलन कारियोें पर अपनी क्रूरता का चरम प्रस्तुत किया वहीं वाहनों को भी नहीं बख्शा, उन्हें क्षतिग्रस्त किया गया। लेकिन राज्य बनने के बाद इस गहरे घाव को लोग भूलते जा रहे हैं व राज्य बनने के बाद इस दिन को याद नहीं किया जाता। यही कारण है कि उत्तराखंड राज्य आंदोलन जनता के धैर्य व संयम का विश्व में उदाहरण बन गया।

उत्तराखंड राज्य निर्माण में पहाड़ों की रानी का विशेष योगदान रहा है जो पर्यटन नगरी पर्यटकों के स्वागत में हर समय सिर झुकाये खड़ी रहती है उसने राज्य आंदोलन में सर उठाया व दो सितंबर 1994 को छह आंदोलन कारियों ने पुलिस की दरिंदगी में प्राण दिए व एक डीएसपी ने भी शहादत दी। लेकिन दो सितंबर की घटना की प्रतिक्रिया पूरे उत्तराखंड में ही नहीं देश व विदेशों में तक हुई व विश्व के प्रमुख अखबारों में मसूरी गोलीकांड को प्रमुखता से प्रकाशित किया गया। लेकिन इससे भी क्रूरतम घटना 15 सितंबर 1994 की है जब मसूरी गोली कांड के शहीदों को श्रद्धासुमन अर्पित करने पूरे राज्य से हजारों की संख्या में लोगों ने मसूरी कूच किया तो बाटाघाट में उन्हें घेर कर मारा गया जिसमें लोगों ने अपनी जान बचाने के लिए खडडों में कूद मारी यही नहीं पुलिस इस कदर वहशीपन पर उतर आई थी कि मसूरी कूच में शामिल करीब ढाई सौ से भी अधिक वाहनों जिसमें बसें, ट्रक, कारें, जीपें व बाइकें आदि थी उन्हें भी पुलिस की दरिंदगी का सामना करना पड़ा।

राज्य बनने के बाद आज भले ही संघर्ष शहादतों, पुलिस के जख्मों को लोग भूल रहे हैं पर ऐ ऐसी घटनाएं है जो उनके जहन से मिटती ही नहीं जिन्होंने इस संघर्ष को जिया और यहीं आने वाले समय में युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा बनेगी। राज्य आंदोलन में मसूरी की अहम भूमिका रही है यहां सेे आंदोलन के दौरान की गई घोषणाओं पर पूरे प्रदेश ने अमल किया व आंदोलन को नई दिशा दी। यही कारण था कि तत्कालीन उत्तर प्रदेश राज्य के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की आंखों की किरकिरी मसूरी बन गई थी। और उन्हीं के इशारे पर 2 सितंबर 1994 की वीभत्स घटना को पुलिस ने अंजाम दिया। व निहत्थे आंदोलन कारियों को गोलियों से छलनी कर दिया। यहंा तक कि पुलिस की बर्बरता को रोकने में डीएसपी को भी अपनी जान गंवानी पड़ी। इससे पूर्व मसूरी के इतिहास में ऐसी कोई घटना नहीं घटी थी कि पुलिस को गोली चलानी पड़ी हो जिससे साफ जाहिर है कि यह योजना सुनियोजित थी व साजिश का हिस्सा था। मसूरी गोलीकांड के आंदोलनकारियों को मसूरी आने के लिए प्रेसित किया व सर पर कफन बांध कर मसूरी कूच किया। कोल्हूखेत पर हजारों आंदोलनकारियों के साथ पुलिस की तीखी झड़पें हुई। जन सैलाब पुलिस की घेराबंदी तोड़ कर आगे बढ़ा लेकिन मुख्य आंदोलनकारियों को गिरफतार कर लिया गया। वहीं केम्पटी की ओर से मसूरी कूच में शामिल होने वाले आंदोलनकारियों को जीरो प्वांइट पर रोका गया। व गिरफतार  किया गया। उसके बाद भी सैकड़ों  आंदोलनकारी पुलिस को चकमा देकर शहीदों को श्रद्धा सुमन अर्पित करने मसूरी पहुंच गये। जिन्हें यहीं गिरफातार किया गया व  बसें भरकर पुलिस उन्हें लाइन ले गई। लेकिन टिहरी की ओर से मसूरी कूच कर रहे आंदोलनकारियों की संख्या बहुत अधिक होने के कारण पुलिस ने पूरी ताकत इन्हें रोकने में झोंक दी। क्यों कि इन्हें रोकपाना पुलिस के लिए टेढ़ी खीर थी। इसमें टिहरी, उत्तरकाशी, बड़ेथी, छाम, लंबगांव, भल्डियाणा, श्रीनगर, पौड़ी व चमोली आदि स्थानों से आ रहे आंदोलनकारी शामिल थे। जो कि सैकड़ोे बसों, ट्रकों, कारों, जीपों व बाइकों के माध्यम से शहीदों के समर्थन में नारेबाजी करते आगे मसूरी की ओर बढ़ रहे थे।पुलिस रोकने की कोशिश कर रही थी लेकिन आंदोलन कारियों का सैलाब पुलिस बैरिकेटिंग तोड़ कर आगे बढ़ता जा रहा था। चंबा, कांणाताल, धनोल्टी में पुलिस बैरिकेट टूट गये थे तथा बाटाघाट में पुलिस की घेराबंदी नाकाम रही तथा जनता आगे बढ़ती गई। जहां पुलिस पीएसी,, सीआरपीएफ, रेपिड एक्शन फोर्स ने रोकने का प्रयास किया। आंदोलनकारियों का कहना था कि वह केवल शहीदों को श्रद्धांजलि दंेने जा रहे हैं। पुलिस ने मसूरी गोलीकांड के  बाद एक और दिल दहला देने वाली घटना बाटाघाट कांड के रूप में घटी

 

जो पुलिस की दरिंदगी का ऐसा रक्त रंजित काला इतिहास बन गया जिसकी खाकी वर्दी में आज भी खून की बू आती है। शायद पूरे विश्व में पुलिस हैवानियत का यह पहला ऐसा प्रकरण बन गया। ऐसी घटना न किसी विश्व युद्ध में सुनी होगी और न ही ब्रिटिश राज्य में ऐसी बर्बरता की कोई मिसाल मिलती है। जहां लोगों को स्वयं मरने के लिए मजबूर किया गया हो। 15 सितंबर मसूरी कूच के ऐलान ने शासन प्रशासन की नींव उड़ा दी थी। जिससे बौखलाकर मसूरी की सारी सीमाएं सील कर दी गई वहीं इतना भारी पुलिस बल बुला दिया व ऐसी स्थिति पैदा कर दी मानों किसी देश ने किसी राज्य पर कब्जा कर लिया हो।चप्पे चप्पे पर पुलिस, पीएसी, सीआरपीएफ, रेपिड एक्शन फोर्स, बख्तरबंद वाहन, बज्र वाहन, स्टेनगनों से लैस वाहन तैनात कर दिए व अघोषित कफर्यू लगा दिया गया। लोगों को घर से बाहर न निकलने का एनांउंसमेंट किया गया। मसूरी आने के सभी मार्ग सील करने के साथ ही कोल्हूखेत, जीरो प्वांइट, व बाटाघाट पर भारी पुलिस बल तैनात कर छावनी में तब्दील कर दिए गये। वहीं मालरोड भी सील कर दिया गया। इसके बावजूद राज्य के लिए मसूरी में शहीद हुए आंदोलनकारियों को श्रद्धांजलि देने के जज्बे ने हजारों आंदोलन पुलिस ने साजिश रची व उन्हें आगे बढ़ने दिया पुलिस ने वुडस्टाक स्कूल के समीप ऐसे स्थान पर घेरने का प्रयास किया जहां से कोेई बच न पाये। पुलिस ने  अपनी साजिश के तहत वुड स्टाक स्कूल के आगे ऐसे स्थान पर रोका जहां पर जहां से न आगे आने का रास्ता था न ही पीछे जाने का रास्ता था। तब पुलिस ने दोनों ओर से लाठी चार्ज किया जिससे लोगों को भागने का रास्ता नहीं मिला उपर की ओर पहाड़ व नीचे की ओर गहरी खाई और पुलिस ने जिस बेरहमी से लाठियां चलाई उससे आंदोलन कारियों को मजबूर होकर खडड में कूद मारनी पड़ी। लेकिन पुलिस की बर्बरता का यहीं अंत नहीं हुआ उन्होंने खडड में गिरे घायलों के उपर पत्थर बरसाये गये। इस घटना में सैकड़ो लोग घायल हो गये जिसमें महिलाएं व बच्चे भी थे। पुलिस की बरसती लाठियां से महिलाओं व बच्चों की चीख पुकार से पूरा वातावरण गूंज उठा। पास में ही वुड स्टाक स्कूल ने जब चीख पुकार सुनी तो वहां पढ़ने वाले विदेशी छात्र छात्राओं शिक्षकों व प्रधानाचार्य आदि ने घायल महिलाओं, पुरूषों व बच्चों का प्राथमिक उपचार किया व उन्हें भोजन आदि उपलब्ध कराया। वहीं कई लोग जंगलों से होते हुए आस पास के लोगों के घरों में शरण ली। इस घटना में कितने मरे कितने गायब हुए किसी को पता नहीं क्यों कि इसके बाद पुलिस ने पूरे शहर में अघोषित कफर्यू लगा दिया। पुलिस की इस वीभत्स घटना के निशान वर्षों तक उक्त स्थल पर महिलाओं की टूटी चूड़िया, जूते चप्पल व छाते आदि के रूप में लोग देखते रहे। आज भी उस स्थान पर ये निशान कहीं न कहीं मिल जायेगें। कई घायलों को लोग अगले दिन खडडों से निकाल कर अस्पताल ले गये। लेकिन बड़े शर्म व दुःख की बात है कि आज जो राजनैतिक दल राज्य निर्माण के बाद सत्ता की मलाई खा रहे हैं उन्होंने कभी 15 सितंबर की घटना को याद नहीं किया।

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